Tuesday, December 18, 2018
Monday, May 26, 2014
जन-जन की ओर से संदेश
2122 2122 2122
आप ने ली जो शपथ, वो याद रखना
जो यहॉं लाये हैं उन को, याद रखना।
राह में आये भले कोई चुनौती
आस जन-जन की तुम्हीं हो, याद रखना।
स्वप्न देखो जब तरक्की अम्न के तुम
खुद से पहले देश देखो, याद रखना।
बॉंटने निकलो तो खुशियॉं बॉंटना तुम
भूल से भी ग़म नहीं दो, याद रखना।
दूरियॉं जिनसे बढ़ें वो भूल कर तुम
दिल मिलें वो बात बोलो, याद रखना।
साथ मिलकर वायदे सारे निभाना
संगठित रहना, न टूटो, याद रखना।
कर सको कुछ, फिर ये अवसर कब मिलेगा
मोह-माया में न लिपटो, याद रखना।
तिलक राज कपूर
Thursday, May 3, 2012
एक ताज़ा ग़ज़ल
हुआ क्या है ज़माने को कोई निश्छल नहीं मिलता
किसी मासूम बच्चे सा कोई निर्मल नहीं मिलता।
युगों की प्यास क्या होती है वो बतलाएगा तुमको
जिसे मरुथल में मीलों तक कहीं बादल नहीं मिलता।
जुनूँ की हद से आगे जो निकल जाये शराफ़त में
हमें इस दौर में ऐसा कोई पागल नहीं मिलता।
यक़ीं कोशिश पे रखता हूँ, मगर मालूम है मुझको
अगर मर्जी़ न हो तेरी, किसी को फल नहीं मिलता।
जहॉं भी देखिये नक़्शे भरे होते हैं जंगल से
ज़मीं पर देखिये तो दूर तक जंगल नहीं मिलता।
समस्या में छुपा होगा, अगर कुछ हल निकलना है
नियति ही मान लें उसको, अगर कुछ हल नहीं मिलता।
हर इक पल जि़ंदगी का खुल के हमने जी लिया 'राही'
गुज़र जाता है जो इक बार फिर वो पल नहीं मिलता।
तिलक राज कपूर 'राही'
Monday, March 5, 2012
होली की अग्रिम बधाई
तरही: रोज पव्वा पी लिया तो पीलिया हो जायेगा
वक्त, यूँ सोचा न था, इक दिन हवा हो जायेगा
जु़ल्फ़ से भरपूर ये सर, चॉंद सा हो जायेगा।
हम मिले, तो पूछ मत, क्या फ़ायदा हो जायेगा
तेरे अब्बा का पता, मेरा पता हो जायेगा।
बंद डिब्बा दूध बच्चा, गुलगुला हो जायेगा
और भूखा बाप इक दिन सींकिया हो जायेगा।
है बहुत मजबूर, अद्धी पी रहा है, जानकर;
रोज पव्वा पी लिया तो पीलिया हो जायेगा।
बस यही तो सोचकर वो शादियॉं करता रहा
दर्द बढ़ता ही गया तो खुद दवा हो जायेगा।
रंग का त्यौहार है छेड़ें न क्यूँकर लड़कियॉं
मुँह अगर काला हुआ तो क्या नया हो जायेगा।
जिस्म सल्लू सा दिखा तो आपसे शादी करी
ये न सोचा था बदन यूँ पिलपिला हो जायेगा।
हो गया बेटा जवां, ये हरकतें मत कीजिये
वरना वो भी आप सा ही मनचला हो जायेगा।
हुस्न की शहजादियों को मुँह लगाना छोडि़ये
गर किसी को भा गया तो पोपला हो जायेगा।
इश्क जिससे हो गया ‘राही’ न शादी कीजिये
इश्क का सारा मज़ा ही किरकिरा हो जायेगा।
Tuesday, October 25, 2011
दीपोत्सव की हार्दिक बधाई
नगर ने गॉंव के हिस्से की बिजली फूँक डाली है
यहॉं पर रात काली है, वहॉं रौशन दीवाली है।
बड़ी तरकीब से तरकीब ये तुमने निकाली है
वतन खुशहाल दिखलाती हुई झॉंकी निराली है।
बहुत छोटा सा इक अरमॉं लिये मायूस है बचपन
मगर मजबूर हैं मॉं-बाप, उनकी जेब खाली है।
खटा दिन रात, वो ये सोचकर, उत्सव मनायेगा
उसे बाज़ार ने बोला कि तेरा नोट जाली है।
कई घर मॉंजकर बर्तन, बचाई जो रकम मॉं ने
चुरा कर एक बेटे ने, जुए की फ़ड़ जमा ली है।
फ़सल अच्छी हुई सोचा सयानी का करें गौना
रकम फ़र्जी हिसाबों में महाजन ने दबा ली है।
कभी था राम ने मारा, उसी मारीचि के मृग ने
बिखर कर हर किसी दिल में जगह अपनी बना ली है।
सदा ही ईदो-दीवाली मनाई साथ में हम ने
सियासत ने मगर दो भाइयों में फ़ूट डाली है।
सियासत वायदे करती है पर पूरे नहीं करती
यहॉं का वायदा तो सिर्फ़ शब्दों की जुगाली है।
तुम्हें अहसास भी इसका कभी होता नहीं शायद
तुम्हारी हरकतों ने देश की पगड़ी उछाली है।
नहीं मॉंगा कभी तुझसे खुदा खुद के लिये लेकिन
दुआ सबके लिये लेकर खड़ा दर पर सवाली है।
चलो संकल्प लें स्वागत में इक दीपक सजाने का
धुँए औ शोर से जो मुक्त हो, सच्ची दीवाली है।
सभी उत्सव, सभी के हैं, चलो 'राही' यही ठानें
दिये दो हम जलायेंगे जहॉं भी रात काली है।
सादर
तिलक राज कपूर 'राही'
Friday, October 14, 2011
करवा चौथ पर विशेष
नया अहसास होता है तो बस इक शेर कहता हूँ।
कभी-कभी सीधे-सादे अहसास सीधे-सादे लफ़्ज़ों में बयॉं करने का दिल करता है और ऐसे में कुछ अशआर जन्म लेते हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति आज प्रस्तुत इस ग़ज़ल में है। एक बहुत सीधी सादी बात आई कि क्या इस बार करवा चौथ पर कुछ नहीं कह रहे। पहले करवा चौथ पर बिटिया की एक सीधी-सादी फ़रमाईश को पूरा करना तो एक ऐसी स्थिति हो गयी कि रुका नहीं गया। बस उसी का परिणाम है ये सीधी-सादी ग़ज़ल बिना किसी पेच-ओ-खम के।
हुस्न आया तो लजाना आ गया
कनखियों से मुस्कराना आ गया।
होंठ होंठों में दबाना आ गया
देख कर नज़रें चुराना आ गया।
चाहते हैं आप ऐसा जानकर
फ़ूल वेणी में सजाना आ गया।
जि़न्दगी में आप का आना सनम
यूँ लगा जैसे खजाना आ गया।
आपके अहसास ने छूकर कहा
मीत जन्मों का पुराना आ गया।
इक अलग अहसास करवा चौथ है
ये लगा जब दिल लगाना आ गया।
साथ करवा चौथ का उत्सव लिये
जि़न्दगी में इक सयाना आ गया।
ख़ैरियत में आपकी उपवास रख
अब हमें भी दिन बिताना आ गया।
दूर झुरमुट में छुपे उस चॉंद को
सॉंझ ढलते ही बुलाना आ गया।
तिलक राज कपूर 'राही'
Tuesday, October 11, 2011
ग़ज़ल गायकी के सम्राट 'जगजीत सिंह' को विशेष श्रद्धॉंजलि
ग़ज़ल क्या होती है, यह समझ भी नहीं थी जब पहली बार जगजीत सिंह की मंत्रमुग्ध कर देने वाली आवाज़ सुनी थी। फिर सुनता रहा, सुनता रहा और जब ग़ज़ल कहना आरंभ किया, दिल ने कहा एक ग़ज़ल ऐसी कहनी है जिसे जगजीत सिंह अपनी आवाज़ से नवाज़ना स्वीकार करें। उस आवाज़ लायक कुछ न कह सका और एकाएक आवाज़ से जग जीतने वाले जगजीत ने यह जग छोड़ दिया। ब्रेन हैमरेज से अस्पताल में भर्ती थे लेकिन लगता था अभी कोई कारण नहीं है जगजीत के जाने का, वो और जियेंगे और फिर कुछ और सुनने को मिलेगा। बस यहीं आदमी और उपर वाले के फ़ैसले का अंतर होता है शायद। उसने वही किया जो उसे ठीक लगा। कल दिन भर जगजीत सिंह की गाई एक ग़ज़ल लौट-लौट कर ज़ेह्न में आ रही थी। बहुत तलाशा नेट पर, नहीं मिली। रुका नहीं गया और एक ग़ज़ल हुई।
आज जगजीत हमारे बीच देह-स्वरूप नहीं लेकिन स्वर-स्वरूप जिंदा हैं और उनके इस स्वर स्वरूप को समर्पित है यह ग़ज़ल।
आज फिर तू, कुछ नया दे, जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी
अब मुझे रब से मिला दे जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।
नस्ल-ओ-मज़्हब के बखेड़ों से अलग मैं रह सकूँ
एक ऐसा आसरा दे, जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।
बंधनों के इस कफ़स में जी चुका इक उम्र मैं
इस से आज़ादी दिला दे जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।
जन्म से सोया हुआ हूँ, ख़्वाब सारे जी चुका
नींद से मुझको उठा दे, जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।
छोड़कर मिट्टी चला हूँ, पूछता हूँ बस यही
क्यूँ मिली मिट्टी, बता दे, जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।
साथ जितना था हमारा, कट गया, जैसा कटा
आज ख़ुश हो कर, विदा दे जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।
सोचना क्या वक्ते रुख़्सत, क्या मिला, क्या खो गया
भूल जा, सब कुछ भुला दे जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।
जा रहा हूँ, छोड़कर रिश्ते कई ऑंसू भरे
दे सके तो हौसला दे जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।
उम्र भर भटका मगर, मंजि़ल न 'राही' को मिली
आज मंजि़ल का पता दे, जि़ंदगी, ऐ जि़ंदगी।
तिलक राज कपूर 'राही'
Sunday, August 21, 2011
एक ग़ज़ल- इस देश के जन जन को समर्पित
देखकर लोकतंत्र तालों में
लोग तब्दील हैं मशालों में।
अब तो उत्तर बहुत कठिन होंगे
इस दफ़्अ: आग है सवालों में।
कोंपलों के भी देखिये तेवर
वो बदलने लगी हैं भालों में।
एकता क्या है अब वो देखेंगे
बॉंटते आये हैं जो पालों में।
वायदे तो बहुत हुए लेकिन
क्या मिला है स्वतंत्र सालों में।
जो हमारे लहू में होनी थी
वो ही लाली है उनके गालों में।
आदमीयत कभी तो समझेंगे
भेडि़ये आदमी की खालों में।
इस लड़ाई में मिट गये हम तो
फिर मिलेंगे तुम्हें मिसालों में।
मंजि़लें ठानकर ये निकले हैं
अब न 'राही' फ़ँसेंगे चालों में।
बह्र: फ़ायलुन्, फ़ायलुन्, मफ़ाईलुन्
Friday, April 29, 2011
ग़ज़ल: फिर से बूढ़ी बातियों में तेल डाला
थक गये जब नौजवॉं, ये हल निकाला
फिर से बूढ़ी बातियों में तेल डाला।
जब से बूढ़ी बातियों में तेल डाला
हर तरफ़ दिखने लगा सबको उजाला।
जो परिंदे थे नये, टपके वही बस
इस तरह बाज़ार को उसने उछाला।
दूर तक अपना नज़र कोई न आया
याद पर हमने बहुत ही ज़ोर डाला।
देर मेरी ओर से भी हो गयी, पर
आपने भी ये विषय हरचन्द टाला।
दिल अगर चाहे, किसी भी राह में फिर
पॉंव को कॉंटे नहीं दिखते न छाला।
जब उसे कॉंधा दिया दिल सोचता था
साथ कितना था सफ़र, क्यूँ बैर पाला।
भूख क्या होती है जबसे देख ली है
अब हलक में जा अटकता है निवाला।
एकलव्यों की कमी देखी नहीं पर
देश में दिखती नहीं इक द्रोणशाला।
तोड़कर दिल जो गया वो पूछता है
दिल हमारे बाद में कैसे संभाला।
जि़ंदगी तेरा मज़ा देखा अलग है
इक नशा दे जब खुशी औ दर्द हाला।
त्याग कर बीता हुआ इतिहास इसने
हरितिमा का आज ओढ़ा है दुशाला।
बस उसी 'राही' को मंजि़ल मिल सकी है
राह के अनुरूप जिसने खुद को ढाला।
तिलक राज कपूर 'राही' ग्वालियरी
Friday, December 17, 2010
आज कुछ श्रंगार की बातें करें
| रोम झंकृत हो रहे हैं, ये शिरायें बज रहीं जो हृदय में उठ रहा, उस ज्वार की बातें करो शेष सारे ही रसों को आज तो विश्राम दो मुक्त मन रसराज की श्रंगार की बातें करो। |
| मुस्कराकर, आपने, देखा इधर, मैं देखता हूँ आपके दिल में जो उपजा, वो शजर मैं देखता हूँ भाव उपजा, उठ गयी, पर लाज से फिर झुक गयी, गिर के उठती, उठ के गिरती, हर नज़र मैं देखता हूँ। |
| प्रेम डगरिया की पुलिया तो, गोरी अभी अधूरी है, बीच समय की बहती नदिया भी अपनी मजबूरी है, पल-पल, क्षण-क्षण, समय कट रहा है, सखियों से कह देना, देर नहीं पिय से मिलने में, बिछिया भर की दूरी है। |
इसी क्रम में आगे बढ़ें तो आता है एक गीत, जो इस प्रकार है:
पश्चिम में डूब गयी, सूरज किरन,
सहमी सी बैठी, नवेली दुल्हन।
युगों युगों के बाद रात इक, यूँ ही नही लजाई है,
बाबुल के अंगना से गोरी, पिय के घर को आई है।
पश्चिम में डूब गयी, सूरज किरन।
रूप की मादक मदिरा मुझपर, आज प्रिये तू छलका दे।
पश्चिम में डूब गयी, सूरज किरन।
जीवन की बगिया में पगली, जब दो सुमन खिलेंगे।
पश्चिम में डूब गयी, सूरज किरन।
वर लूँगी मैं बिना लजाये, ये हैं मेरे अपने।
पश्चिम में डूब गयी, सूरज किरन।
Wednesday, November 3, 2010
दीपोत्सव की बहुत-बहुत बधाई
कहने की आवश्यकता नहीं कि ग़ज़ल गैर मुरद्दफ़ है और इसके अ’र्कान फ़़ायलातुन, फ़़ायलातुन, फ़़ायलातुन, फ़़ायलुन यानि 2122, 2122, 2122, 212 हैं जो मेरी प्रिय बह्र है।
एक ग़ज़ल
वायदा है मैं तिमिर से हर घड़ी टकराउँगा
स्नेह पाया है जगत से रौशनी दे जाउँगा।
कौन हूँ मैं बूझ पाओ तो मुझे तुम बूझ लो
लौ पुराना प्रश्न है जो मैं नहीं सुलझाउँगा।
बात जब मेरी हुई तो तेल बाती की हुई
मैं रहा जिस पात्र में गुणगान उसके गाउँगा।
एक बच्चा मित्रता करने पटाखों से चला
आग से मत खेलना उसको यही समझाउँगा।
खुद अगर कोई पतंगा आ गिरा आग़ोश में
हाथ मलने के सिवा कुछ भी नहीं कर पाउँगा।
एक अनबन सी रही बारूद की मुझसे मगर,
वो गले मेरे लगा तो किस तरह ठुकराउँगा।
साथ में तूफॉं लिये अब ऑंधियॉं चलने लगीं
बुझ गया तो मैं मिसालों में दिया कहलाउँगा।
कब्र, मंदिर, राह हो या फिर मज़ारे पीर हो
जिस जगह भी रख दिया, मैं रौशनी बिखराउँगा।
जो डगर मैनें चुनी वो आपको लगती कठिन
राह बारम्बार लेकिन मैं यही दुहराउँगा।
वक्त जाने का हुआ है भोर अब होने लगी
सूर्य से रिश्ता अजब है, वो गया तो आउँगा।
गर कभी मद्धम हवा निकली मुझे छूते हुए
नृत्य में खो जाउँगा, इतराउँगा, इठलाउँगा।
धर्म, जात औ, उम्र क्या औ कर्म का अंतर है क्या
जब मुझे ‘राही’ दिखेगा, राह मैं दिखलाउँगा।
तिलक राज कपूर ‘राही’ ग्वालियरी
Wednesday, October 27, 2010
करवा चौथ को समर्पित एक ग़ज़़ल
यह ग़ज़़ल विशेष रूप से करवा चौथ को समर्पित है। इसका पूरा आनंद गुनगुना कर लेने के लिये ‘कल चौदवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा’ या ‘ये दिल, ये पागल दिल मेरा, क्यों बुझ गया, आवारगी’ की लय का स्मरण करें।
ग़ज़़ल
छूकर इसे, तुमने किया, खुश्बू भरा, अच्छा लगा,
बदला हुआ, स्वागत भरा, जब घर मिला, अच्छा लगा।
नादान थे, अनजान थे, परिचित न थे, लेकिन हमें,
जब दिल मिले, रिश्ता लगा, जाना हुआ, अच्छा लगा
जब सात फेरों के वचन से जन्म सातों बॉंधकर
तूने मुझे, मैनें तुझे, अपना लिया, अच्छा लगा।
तुमने कहा, मैनें सुना, मैनें कहा, तुमने सुना,
सुनते सुनाते वक्त ये, अपना कटा, अच्छा लगा।
वो फासला, जो था बना, ग़फ़्लत भरी, इक धुँध से,
कोशिश हमारी देखकर, जब मिट गया, अच्छा लगा।
तुम सामने बैठे रहो, श्रंगार मेरा हो गया,
इस बार करवा चौथ पर, तुमने कहा, अच्छा लगा।
‘राही’ कटेगी जिन्दगी, महकी हुई, खुशियों भरी,
इस बात का, जब आपने, वादा किया, अच्छा लगा।
तिलक राज कपूर 'राही ग्वालियरी'
Sunday, October 3, 2010
सांप्रदायिक सद्भाव पर एक ग़ज़ल
तमाम शंकाओं, कुशंकाओं के बीच आखिर, एक बहुप्रतीक्षित फ़ैसला आ ही गया और देश के जन-जन ने संपूर्ण विषय को न्यायपालिका का कार्यक्षेत्र मानकर; निर्णय को सहजता से स्वीकार कर साम्प्रदायिक सद्भाव का उदाहरण दिया। देश का जन-जन इस सांप्रदायिक सद्भाव के लिये हार्दिक बधाई का पात्र है और ऐसे हर सद्भावी को आज की ग़ज़ल समर्पित है। इस ग़ज़ल का कोई भी शेर मेरा नहीं, यह केवल और केवल जन-जन की भावनाओं की अभिव्यक्ति का प्रयास है।
ग़ज़ल
कभी न हुक्म में उसके इदारत कीजिये साहब
सदाकत से सदा उसकी इताअत कीजिये साहब।
इदारत- संपादन, एडीटरी
इताअत- आज्ञा-पालन, फ़र्माबरदारी, सेवा, खिदमत
न उसकी राह चलने में इनाअत कीजिये साहब
उसी के नाम पर, लेकिन इनाबत कीजिये साहब
इनाअत- विलंब, देर ढील, सुस्ती
इनाबत- ईश्वर की ओर फि़रना, बुरे कामों से अलग हो जाना, तौबा करना
अगर कर पायें तो, इतनी इनायत कीजिये साहब
दिलों में फ़ूट की न अब, शरारत कीजिये साहब।
इनायत- कृपा
बड़ी मुश्किल से, अम्नो-चैन की तस्वीर पाई है
यही कायम रहे, ऐसी वकालत कीजिये साहब।
शहर के बंद रहने से कई चूल्हे नहीं जलते
न ऐसा हो कभी ऐसी इशाअत कीजिये साहब।
इशाअत- प्रचार, प्रसार
जुनूँ छाया है दिल में गर किसी को मारने का तो,
इताहत- मार डालना, हलाक करना
वो मेरा हो, या तेरा हो, या इसका हो, या उसका हो
सभी मज़्हब तो कहते हैं इआनत कीजिये साहब।
इआनत- सहायता, मदद, सहयोग
किसी मज़्हब में दुनिया के कहॉं नफ़्रत की बातें हैं
अगर वाईज़ ही भटकाये, खिलाफ़त कीजिये साहब।
वाईज़- धर्मोपदेशक
सियासत और मज़्हब जोड़ना फि़त्रत है शैतानी
इन्हें जोड़े अगर कोई, मलामत कीजिये साहब।
सियासत- राजनीति
मलामत- निंदा
जरूरी तो नहीं मंदिर औ गिरजा या हो गुरुद्वारा
सुकूँ मिलता जहॉं पर हो इबादत कीजिये साहब।
इबादत- उपासना, अर्चना, पूजा
अगर ये थम गया तो फिर तरक्की हो नहीं सकती
वतन चलता रहे ऐसी सियासत कीजिये साहब।
सियासत- राजनीति
सभी मज़्हब सिखाते हैं शरण में गर कोई आये
तो अपनी जान से ज्यादह हिफ़ाज़त कीजिये साहब।
हिफ़ाज़त- रक्षा, बचाव, देख-रेख
अगर हम दूरियों को दूर ही रक्खें तो बेहतर है
मिटाकर दूरियॉं सारी रफ़ाकत कीजिये साहब।
रफ़ाकत- मैत्री, दोस्ती
कहॉं धरती सिवा जीवन वृहद् ब्रह्मांड में जाना
किसी भी जीव से फिर क्यूँ शिकायत कीजिये साहब?
वकालत को अगर 'राही' बनाया आपने पेशा
न इन फ़िर्क़:परस्तों की हिमायत कीजिये साहब।
फ़िर्क़:परस्तों - साम्प्रदायिकता रखने वाले, साम्प्रादायिक भेदभाव फैलाकर आपस में लड़ाने वाले
तिलक राज कपूर 'राही' ग्वालियरी
Wednesday, September 29, 2010
सूर्य का विश्राम पल होता नहीं
ग़ज़ल
रात हो या दिन, कभी सोता नहीं,
सूर्य का विश्राम पल होता नहीं।
चाहतें मुझ में भी तुमसे कम नहीं,
चाहिये पर, जो कभी खोता नहीं।
मोतियों की क्या कमी सागर में है,
पर लगाता, अब कोई गोता नहीं।
देखकर, परिणाम श्रम का, देखिये
बीज कोई खेत में बोता नहीं।
व्यस्तताओं ने शिथिल इतना किया
अब कोई संबंध वो ढोता नहीं।
क्यूँ में दोहराऊँ सिखाये पाठ को
आदमी हूँ, मैं कोई तोता नहीं।
देख कर ये रूप निर्मल गंग का
पाप मैं संगम पे अब धोता नहीं।
जब से जानी है विवशता बाप की,
बात मनवाने को वो रोता नहीं।
हैं सभी तो व्यस्त 'राही' गॉंव में
मत शिकायत कर अगर श्रोता नहीं।
तिलक राज कपूर 'राही' ग्वालियरी
Saturday, September 11, 2010
ईद मुबारक
| दो तीन दिन से मन में विचार चल रहा था कि ईद के मुबारक मौके पर एक ग़ज़ल ब्लॉग पर लगाई जाये। बहुत कोशिश करने पर भी सफ़ल नहीं रहा तो एक बार फिर मदद मिली कभी पढ़ी हुई एक ग़ज़ल से जिसका बस यही एक मिसरा याद रहा है कि 'मिलें क्यूँ न गले फिर शंभु और सत्तार होली में' । किसकी ग़ज़ल है यह याद नहीं। बस इसी को आधार बना कर कुछ भावनायें व्यक्त करने की कोशिश की है। बेटे को फोटोग्राफ़ी का शौक है, सुब्ह-सुब्ह निकल पड़ा भोपाल की शान 'ताज-उल-मसाजि़द' की ओर। उसी का लिया एक फ़ोटोग्राफ़ लगा रहा हूँ, और फ़ोटो देखना चाहें तो फ़ेसबुक पर निशांत कपूर को तलाश लें। ग़ज़ल नहीं कुछ और दिल को चाहिये इस बार ईदी में खुदा तू जोड़ दे इंसानियत के तार ईदी में। तेरी नज़्रे इनायत से न हो महरूम कोई भी सभी के नेक सपने तू करे साकार ईदी में। न कोई ग़म किसी को हो दुआ दिल से मेरे निकले गले सबसे मिले खुशियों भरा संसार ईदी में। रहे न फ़र्क कोई मंदिर-ओ-मस्जि़द औ गिरजा में सभी मिलकर सजायें उस खुदा का द्वार ईदी में। मुहब्बत ही मुहब्बत के नज़ारे हर तरफ़ देखूँ खुदा निकले दिलों से इक मधुर झंकार ईदी में। मिटाकर नफ़्रतों को भाईचारे की इबादत हो करें इंसानियत का मिल के सब श्रंगार ईदी में। खुदा से मॉंगता आया है पावन ईद पर ‘राही’ बढ़ा दिल में सभी के और थोड़ा प्यार ईदी में। तिलक राज कपूर ‘राही’ ग्वालियरी |
Sunday, August 15, 2010
आतंकवादी की फरमाईश पर ग़ज़ल-2
आतंकवादी तो बड़ा शरीफ़ निकला; मेरी व्यस्तता की स्थिति से समझौता कर सब्र से बैठा हुआ है। मेरा दिल नहीं माना। सोचा इस अवकाश का लाभ लेकर कुछ मुहब्बत भरी बात कही जाये। बस पेश है।
ग़ज़ल को सामान्यतय: कोई शीर्षक नहीं दिया जाता है लेकिन मुझे लगता है कि इस ग़ज़ल में यह गुँजाईश है। इसका हर शेर मुहब्बत की ही बात कहता है और हर शेर में मुहब्बत शब्दश: अलग रंग लिये हुए मौज़ूद है। इस ग़ज़ल का हर काफि़या उर्दू से है। जहाँ हिन्दी भाषियों को कठिनाई हो सकती है वहॉं सुविधा के लिये उर्दू शब्द का अर्थ सम्मिलित कर लिया है।
मुहब्बत
मुहब्बत के उसमें दिखे ये निशाँ से
खयालों में ग़ुम बेखुदी इस जहाँ से।
(निशाँ- निशान; जहाँ- दुनिया)
मुहब्बत में पाये हर इक आस्ताँ से,
गिले, शिकवे, ताने सभी की ज़बाँ से।
(आस्ताँ- दहलीज़, ड्यौढ़ी; ज़बाँ - जिव्हा, जीभ)
कोई मर मिटेगा, मुहब्बत में तेरी
अगर तीर छोड़ा नयन की कमाँ से।
बदलता ही रहता है ये रंग अपने
सम्हल कर मुहब्बत करो आस्माँ से।
भला किसकी खातिर हो दौलत के पीछे
मुहब्बत तो मिलती नहीं है दुकाँ से।
वतन की हिफ़ाजत में वर्दी पहन कर
मुहब्बत न हमने करी जिस्मो-जाँ से।
मुहब्बत तो मॉंगे है ज़ज्ब: दिलों का
सितारे न चाहे कभी कहकशाँ से।
(कहकशाँ- आकाश गंगा)
समाया हुआ है मज़ा इसमें लेकिन
मुहब्बत न करना ज़मीन-ओ मकाँ से।
मुहब्बत को पर्वाज़ देने चला हूँ
इज़ाज़त तो ले लूँ मैं उस मेह्रबाँ से।
(पर्वाज़- उड़ान)
बने फ़स्ले-गुल से मुहब्बत के नग़्मे
नयी रंगो-बू फिर उठी गुलिस्ताँ से।
(फ़स्ले-गुल-बसंत ऋतु; रंगो-बू- रंग और सुगंध; गुलिस्ताँ-उद्यान, वाटिका)
डराने से पीछे हटी न मुहब्बत,
लड़ी है हमेशा ये दौरे-ज़माँ से।
(दौरे-ज़माँ- ज़माने का समय या काल)
अगर तल्ख़ लगती है तुमको मुहब्बत
कला इसकी सीखो किसी कारदाँ से।
(तल्ख़- कड़वी, अरुचिकर; कारदाँ- अनुभवी)
इबादत मुहब्बत की करने चला तो,
मिले मुझको 'राही' सभी यकज़बाँ से।
(इबादत- आराधना, पूजा; यकज़बाँ- सहमत, एकराय)
तिलक राज कपूर 'राही' ग्वालियरी
Sunday, June 20, 2010
एक आतंकवादी की फरमाईश पर ग़ज़ल
अभी हाल ही में मैं एक आतंकवादी गतिविधि का शिकार हुआ हूँ जिसका विवरण आपसे बॉंटना जरूरी है। हमला चैट पर हुआ जिसकी पूरी प्रति इस प्रकार है।
शुक्रवार दिनांक 19 जून 2010
आतंकवादी: आपको सूचित किया जाता है कि 24 घंटे के अन्दर 'रास्ते की धूल' पर एक ग़ज़ल लगाना है आपको, अगर ऐसा न किया तो आप पर देर तक तरसाने का आरोप लगाते हुए एक हफ़्ते में एक ग़ज़ल लगाने का जुर्माना लगाया जा सकता है; और आपको यह मानना होगा।
मैं: यह तो आतंकवादी हमला है।
आतंकवादी: बतादूँ कि आपको हर हफ़्ते एक ग़ज़ल दो महीने तक लगानी पड़ेगी।
शनिवार दिनांक 20 जून 2010
आतंकवादी: आपको सूचित किया जाता है कि नोटिस जारी होने के बावजूद आपने रास्ते कि धुल पर नई पोस्ट नहीं लगाई, अब आपको हर हफ्ते एक गजल पोस्ट करनी है, और ऐसा २ महीने तक करना है, ऐसा ना होने पर आवश्यक कार्यवाही की जायेगी
मैं: हम सच्चे हिन्दुस्तानी, आतंकवादी धमकियों से नहीं डरते। हॉं फिरौती में एकाध ग़ज़ल में सौदा पटता हो तो बोलो।
आतंकवादी: फिरौती का समय निकल चुका है
मैं: तो ले जाओ हमें ही, हम तो बंधक बनने को तैयार हैं।
आतंकवादी: हा हा हा, आपको बंधक बनाना हमें भारी पड़ जाएगा, हमें तो आपकी गजल चाहिए
मैं: कल संभव है। आज तो अभी रात के 2-3 बज जायेंगे आफिस के काम में ही।
आतंकवादी: तो ठीक है इस हफ्ते की गजल कल, फिर अगले हफ्ते १ गजल, फिर उसके अगले हफ्ते १, फिर अगले में १, ठीक है न।
मैं: ग़ज़ल के शेर ऐ लोगो निकाले कब निकलते हैं, कभी चुटकी में बन जायें कभी इक याम लग जाये।
आतंकवादी: ये सब नहीं चलेगा, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा
मैं: वस्तुत: इस समय मुझे एक अत्यंत महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया है जिसमें दो तीन महीने व्यवस्था बनाने में लग जायेंगे, फिर संभव है कुछ समय के लिये आराम रहे।
आतंकवादी: ओह ऐसा, बहुत बढ़िया
मैं: लोक सेवक होने के नाते पहले पब्लिक की बजानी जरूरी है, जनता जो तनख्वाह देती है उसका कर्जा उतारने के मौके कम मिलते हैं।
आतंकवादी: ये भी सही है। ठीक है कल गजल का इंतज़ार करते हैं
मैं: ये हुई न अच्छे बच्चों वाली बात। ठीक है। अलविदा।
आतंकवादी: नमस्ते
मैं इस आतंकवादी से भयभीत नहीं हूँ और दुआ करता हूँ कि हर आतंकवादी ऐसा ही हो जाये। मेरी दुआ दिल से है यह सिद्ध करने के लिये उसकी दिली फरमाईश पूरी कर रहा हूँ। अब अल्प समय में एक नयी ग़ज़ल तैयार हो जाये ये हमेशा संभव तो नहीं होता लेकिन जो कुछ कच्चा-पक्का बन सका परोस रहा हूँ, इस आशा के साथ कि इस आतंकवादी के विचार मात्र दो महीने का समय मुझे दे दें फि़र पूरे जोशोखरोश के साथ लौटता हूँ।
ग़ज़ल
कल तक जो लड़ रहे थे किसी दक्ष की तरह
निस्तेज हो गये हैं वही सक्ष की तरह। सक्ष: पराजित
कपड़ों के, रोटियों के, मकानों के वास्ते
कुछ प्रश्न पूछते हैं सभी, यक्ष की तरह।
ढूँढी तमाम उम्र, जगह मिल सकी न मॉं,
सुख दे सके मुझे जो तेरे वक्ष की तरह।
सर रख के फाईलों पे कई सो रहे यहॉं,
दफ़्तर समझ रखा है शयन-कक्ष की तरह।
वो वक्त और था, वो ज़माना ही और था,
हम भी थे सल्तनत में कभी अक्ष की तरह।
संसद सा हो गया है मेरा घर ही आजकल,
गुट बन गये हैं पक्ष और विपक्ष की तरह।
क्यूँकर ये चॉंद भी है अजब हरकतों में ग़ुम
लगता है पक्ष शुक्ल, कृष्ण-पक्ष की तरह।
है आपको खबर कि ज़हर से बनी हैं ये
क्यूँ बेचते हैं आप इन्हें भक्ष की तरह। भक्ष: खाने का पदार्थ
क्यूँ कर न आपकी ही शरण में बसे रहें
हमको तुम्हारा एक करम, लक्ष की तरह। लक्ष: एक लाख; सौ हजार
जज़्बा यही है, अपनी इबादत यही रही
हम देश से जुड़े हैं किसी रक्ष की तरह। रक्ष: रक्षक, रखवाला
अच्छी भली ग़ज़ल है, सुनाते नहीं हैं क्यूँ
'राही' छिपाईये न इसे मक्ष की तरह। मक्ष: अपने दोष को छिपाना
तिलकराज कपूर 'राही' ग्वालियरी
Tuesday, May 4, 2010
बह्र-ए-हज़ज़ मुसम्मन् सालिम पर एक ग़ज़ल
इस ब्लॉग पर मैं एक से ज्यादह पोस्ट एक माह में लगाने का इच्छुक नहीं पर परिस्थिति कुछ ऐसी बनी है कि इस बार बहुत कम अंतराल से एक नयी ग़ज़ल लगानी पड़ गयी। हुआ यूँ कि मेरे ही एक अन्य ब्लॉग 'कदम-दर-कदम' पर चर्चा के लिये जो ग़ज़ल प्राप्त हुई उसका हल निकालना एवरेस्ट पर चढ़ाई जैसा काम हो गया और एक उदाहरण ग़ज़ल लगाने की विवशता हो गयी जिससे उसपर काम करना व्यवहारिक हो सके। यह ग़ज़ल विशेष रूप से इसी के लिये कही गयी है। इसकी बह्र मफाईलुन् (1222 x 4) की आवृत्ति से बनी बह्र-ए-हज़ज़ मुसम्मन् सालिम है
ग़ज़ल
हमारे नाम लग जाये, तुम्हारे नाम लग जाये
मुहब्बत में न जाने कब कोई इल्ज़ाम लग जाये।
तुम्हारी याद ने मिटना है गर इक जाम पीने से
कभी पी तो नहीं लेकिन लबों से जाम लग जाये।
मेरी हर सॉंस पर लिक्खा तेरा ही नाम है दिलबर
दुपहरी थी तुम्हारे नाम पर अब शाम लग जाये।
न भाषा की, न मज़्हब की कोई दीवार हो बाकी
गले रहमान के तेरे, जो मेरा राम लग जाये।
करिश्मा ही कहेंगे लोग, कुदरत का अगर देखें
बबूलों में पले इक नीम में गर आम लग जाये।
जवॉं बहनें, रिटायर बाप, कबसे आस रखते हैं
खुदाया घर के बेटे का कहीं तो काम लग जाये।
ग़ज़ल के शेर ऐ लोगों निकाले कब निकलते हैं
कभी चुटकी में ये निकलें, कभी इक याम लग जाये।
किसानों की इबादत तो यही ऐ दोस्त होती है
फसल की चौकसी करना भले ही घाम लग जाये।
अगर दुश्मन हुआ जीवन तो चल इक काम हम करलें
इबादत में इसी की ये दिले बदनाम लग जाये।
सुना है ख़ौफ़ सा लगने लगा है आज संसद में
वहॉं की लाज रखने में कोई बन श्याम लग जाये।
कई फाके बिताकर दिल मेरा कहने लगा 'राही'
चलें बाज़ार में शायद हमारा दाम लग जाये।
Friday, April 30, 2010
ये न पूछो कि कैसे कटी जि़न्दगी
अज़हर हाशमी साहब जब पढ़ने को खड़े हुए तो आवजें आने लगीं 'चाय की चुस्कियॉं'-'चाय की चुस्कियॉं'। मुझे समझने में दो मिनट लगे होंगे कि ये उनकी कोई मशहूर ग़ज़ल है। ग़ज़ल थी:
चाय की चुस्कियों में कटी जि़न्दगी,
प्यालियों, प्यालियों में बँटी जि़न्दगी।
अज़हर हाशमी साहब की आवाज़ का जादू ही कहूँगा कि चाय की चुस्कियॉं दिमाग़ छोड़ने को तैयार ही नहीं, सुब्ह चार बजे तक कवि सम्मेलन चला, फिर सोम ठाकुर जी को विदा कर करीब 8 बजे जब फुर्सत मिली तो रुका नहीं गया और मेरे अंदर का शाइर जाग गया। शाम तक ग़ज़ल पूरी हो चुकी थी। आज वही ग़ज़ल प्रस्तुत है, बहुत कुछ भूल चंका हूँ, लगभग आधे शेर दुबारा कहे हैं। यह ग़ज़ल हमेशा चाय की चुस्कियों को समर्पित रही है, आज भी है। तक्तीअ करने पर कुछ पंक्तियॉं बह्र से बाहर लगती हैं, लेकिन स्वरों का खेल है ये, गेयता में बाहर कुछ भी नहीं।
इसकी बह्र है फायलुन, फायलुन, फायलुन, फायलुन यानि 212, 212, 212, 212
ग़ज़ल
ये न पूछो कि कैसे कटी जि़न्दगी,
कितने धागों से हमने बटी जि़न्दगी।
कुछ सपन लेके आगे सरकती रही
उड़ न पाई कभी परकटी जि़न्दगी।
कोई सुख जो मिला तो हृदय ने कहा
लग रही है मुझे अटपटी जि़न्दगी।
कल की यादें कभी, कल के सपने कभी,
आज को भूलकर क्यूँ कटी जि़न्दगी।
हैं क्षितिज हमने कितने ही देखे यहॉं
है शिखर, है कभी तलहटी जि़न्दगी।
करवटें, करवटें ही बदलती रही
जि़न्दगी भर मिरी करवटी जि़न्दगी।
धूप में खेलती, मेह में खेलती,
याद आती है वो नटखटी जि़न्दगी।
धूल राहों पे खाई तो समझा है ये,
रोग है जि़न्दगी, है वटी जि़न्दगी।
सत्य अन्तिम है क्या जान पाई नहीं,
देह से ही हमेशा सटी जि़न्दगी।
मौत आई तो इक शब्द लिख न सके
उम्र के हाशिये से फटी जि़न्दगी।
हम भी 'राही' बने साथ चलते रहे,
राह अपनी न इक पल हटी जि़न्दगी।
Wednesday, April 21, 2010
एक नज़्म- मॉं की याद में
आज प्रस्तुत नज़्म जब कही थी तब मेरी 'मॉं' का भौतिक अस्तित्व था, अब नहीं। इसे 27 मार्च को उनकी चौथी पुण्यतिथि पर पोस्ट करने का इरादा था लेकिन परिस्थितियॉं कुछ ऐसी रहीं कि ऐसा करना संभव न हो सका। आज 22 अप्रैल को उनके जन्मदिवस के स्मरण के रूप में अवसर बना है इसे पोस्ट करने का।
वज़ीर आग़ा साहब की एक ग़ज़ल पढ़ी थी करीब 30 वर्ष पहले जिसके दो शेर दिल में बस गये थे कि:
मैला बदन पहन के न इतना उदास हो
लाजि़म कहॉं कि सारा जहां खुशलिबास हो।
और
इतना न पास आ कि तुझे ढूँढते फिरें
इतना न दूर जा कि हम:वक्त पास हो।
इस दूसरे शेर से आभार सहित एक भाव लिया है प्रस्तुत नज़्म में।
मैं; यूँ तो नज़्म नहीं कहता, मुझसे हो नहीं पाता, बहुत कठिन काम है; लेकिन न जाने कब किस हाल में कुछ शब्द ऐसा रूप ले सके जिन्हें एक नज़्म के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ। प्रबुद्ध पाठक ही बता पायेंगे कि ये नज़्म है या नहीं।
बहुत धीरे से देकर थपकियॉं मुझको सुलाती थी,
कभी मैं रूठ जाता था तो अनथक वह मनाती थी।
नज़र से दूर जो जितना, वो दिल के पास है उतना,
ये रिश्ता दूरियों का वो मुझे अक्सर बताती थी।
अभी कुछ देर पहले ही
जो उसकी याद का झोंका
ज़ेह्न के पास से गुजरा
मुझे ऐसा लगा जैसे
कहीं वो मुस्कुराई है,
मगर वो दूर है इतनी
कि मुझ तक आ नहीं सकती।
मगर वो दूर है इतनी कि मुझ तक आ नहीं सकती,
बस उसकी याद आई है, बस उसकी याद आई है।