Wednesday, October 27, 2010

करवा चौथ को समर्पित एक ग़ज़़ल

पंकज सुबीर जी के ब्‍लॉग पर इस बार तरही का जो मिसरा दिया गया है उसकी बह्र ग़ज़़ल साधना में लगे नये साधकों के लिये बड़े काम की है ऐसा मेरा मानना है। पहली बार ऐसा हुआ कि किसी तरही के लिये मुझे बहुत गंभीरता से प्रयास करना पड़ा, इस प्रयास में बहुत सा मसाला इकट्ठा हो गया और तरही की ग़ज़़ल भेजने के बाद ऐसा लगा कि इस बह्र पर कुछ और काम करना जरूरी है। इसी प्रयास में ‘अच्‍छा लगा’ रदीफ़ लेकर एक ग़ज़़ल पर काम कर रहा था कि ‘करवा चौथ’ की पूर्व रात्रि आ गयी और कुछ ऐसी अनुभूति हुई कि एक शेर ‘करवा चौथ’ पर बन गया। स्‍वाभाविक है कि इससे लोभ पैदा हो गया एक ग़ज़़ल ‘करवा चौथ’ को समर्पित करने का। मैं सामान्‍यतय: निजि जीवन से ग़ज़़ल के लिये अनुभूति नहीं ले पाता हूँ इसलिये कुछ समय लग गया और ग़ज़़ल आज ऐसा रूप ले सकी कि प्रस्‍तुत करने का साहस कर सकूँ। इस ग़ज़़ल के लिये प्रेरणा मिली ‘करवा चौथ’ से और साहस मिला प्राण शर्मा जी की ग़ज़़लों से जिनमें निजि पलों की खूबसूरती देखते ही बनती है।
यह ग़ज़़ल विशेष रूप से करवा चौथ को समर्पित है। इसका पूरा आनंद गुनगुना कर लेने के लिये ‘कल चौदवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा’ या ‘ये दिल, ये पागल दिल मेरा, क्यों बुझ गया, आवारगी’ की लय का स्‍मरण करें।

ग़ज़़ल

छूकर इसे, तुमने किया, खुश्‍बू भरा, अच्‍छा लगा,
बदला हुआ, स्‍वागत भरा, जब घर मिला, अच्‍छा लगा।


नादान थे, अनजान थे, परिचित न थे, लेकिन हमें,
जब दिल मिले, रिश्‍ता लगा, जाना हुआ, अच्‍छा लगा


जब सात फेरों के वचन से जन्‍म सातों बॉंधकर
तूने मुझे, मैनें तुझे, अपना लिया, अच्‍छा लगा।


तुमने कहा, मैनें सुना, मैनें कहा, तुमने सुना,
सुनते सुनाते वक्‍त ये, अपना कटा, अच्‍छा लगा।


वो फासला, जो था बना, ग़फ़्लत भरी, इक धुँध से,
कोशिश हमारी देखकर, जब मिट गया, अच्‍छा लगा।


तुम सामने बैठे रहो, श्रंगार मेरा हो गया,
इस बार करवा चौथ पर, तुमने कहा, अच्‍छा लगा।


‘राही’ कटेगी जिन्‍दगी, महकी हुई, खुशियों भरी,
इस बात का, जब आपने, वादा किया, अच्‍छा लगा।

तिलक राज कपूर 'राही ग्‍वालियरी'