Friday, April 30, 2010

ये न पूछो कि कैसे कटी जि़न्‍दगी

मध्‍यप्रदेश राज्‍य के मालवॉंचल में स्थित है आगर-मालवा, एक छोटा सा कस्‍बा। सरल जनजीवन और अपने-अपने काम में लगे रहने वाले सरल लोगों का सान्निध्‍य प्राप्‍त हुआ मुझे वर्ष 1983 से 1985 की अवधि में। वहीं मेरे एक सहकर्मी थे मनहर 'परदेसी', गीत और काव्‍य लिखते थे। कुछ स्‍थानीय सहयोग और कुछ उनके प्रयास आधार रहे 'प्रतिभा काव्‍य मंच' के गठन के। यह मंच परदेसी जी की गीत पुस्तिका के साथ ही निष्‍प्राण हो गया लेकिन लगभग डेढ़ दो वर्ष के जीवनकाल में मुझे अच्‍छे अवसर प्रदान कर गया। इसी मंच में जनाब मोहसिन अली रतलामी का स्‍नेह मुझे मिला और उन्‍होंने मेरी पहली ग़ज़ल पर इस्‍स्‍लाह दी। जो उन्‍हें ज्ञात था उसपर मेरा पूराहक़ था जानने का। सुना है उनका इंतकाल हो चुका है, परवरदिगार ने उनकी रूह को निश्चित ही ज़न्‍नत बख्‍शी होगी। शायद 1984 की सर्दियॉं थीं, इसी मंच ने एक कवि सम्‍मेलन आयोजित किया था जिसमें सोम ठाकुर जी, जनाब अज़हर हाशमी, जनाब अख्‍़तर ग्‍वालियरी और कई अन्‍य ने भाग लिया।
अज़हर हाशमी साहब जब पढ़ने को खड़े हुए तो आवजें आने लगीं 'चाय की चुस्कियॉं'-'चाय की चुस्कियॉं'। मुझे समझने में दो मिनट लगे होंगे कि ये उनकी कोई मशहूर ग़ज़ल है। ग़ज़ल थी:
चाय की चुस्कियों में कटी जि़न्‍दगी,
प्‍यालियों, प्‍यालियों में बँटी जि़न्‍दगी।
अज़हर हाशमी साहब की आवाज़ का जादू ही कहूँगा कि चाय की चुस्कियॉं दिमाग़ छोड़ने को तैयार ही नहीं, सुब्‍ह चार बजे तक कवि सम्‍मेलन चला, फिर सोम ठाकुर जी को विदा कर करीब 8 बजे जब फुर्सत मिली तो रुका नहीं गया और मेरे अंदर का शाइर जाग गया। शाम तक ग़ज़ल पूरी हो चुकी थी। आज वही ग़ज़ल प्रस्‍तुत है, बहुत कुछ भूल चंका हूँ, लगभग आधे शेर दुबारा कहे हैं। यह ग़ज़ल हमेशा चाय की चुस्कियों को समर्पित रही है, आज भी है। तक्‍तीअ करने पर कुछ पंक्तियॉं बह्र से बाहर लगती हैं, लेकिन स्‍वरों का खेल है ये, गेयता में बाहर कुछ भी नहीं।

इसकी बह्र है फायलुन, फायलुन, फायलुन, फायलुन यानि 212, 212, 212, 212

ग़ज़ल
ये न पूछो कि कैसे कटी जि़न्‍दगी,
कितने धागों से हमने बटी जि़न्‍दगी।

कुछ सपन लेके आगे सरकती रही
उड़ न पाई कभी परकटी जि़न्‍दगी।

कोई सुख जो मिला तो हृदय ने कहा
लग रही है मुझे अटपटी जि़न्‍दगी।

कल की यादें कभी, कल के सपने कभी,
आज को भूलकर क्‍यूँ कटी जि़न्‍दगी।

हैं क्षितिज हमने कितने ही देखे यहॉं
है शिखर, है कभी तलहटी जि़न्‍दगी।

करवटें, करवटें ही बदलती रही
जि़न्‍दगी भर मिरी करवटी जि़न्‍दगी।

धूप में खेलती, मेह में खेलती,
याद आती है वो नटखटी जि़न्‍दगी।

धूल राहों पे खाई तो समझा है ये,
रोग है जि़न्‍दगी, है वटी जि़न्‍दगी।

सत्‍य अन्तिम है क्‍या जान पाई नहीं,
देह से ही हमेशा सटी जि़न्‍दगी।

मौत आई तो इक शब्‍द लिख न सके
उम्र के हाशिये से फटी जि़न्‍दगी।

हम भी 'राही' बने साथ चलते रहे,
राह अपनी न इक पल हटी जि़न्‍दगी।

30 comments:

देव कुमार झा said...

चाय की चुस्कियों में कटी जि़न्‍दगी,
प्‍यालियों, प्‍यालियों में बँटी जि़न्‍दगी

बेहतरीन... और एकदम सटीक.

वीनस केशरी said...

पहली इस्लाह कई मायनों में हैरतअंगेज होती है
कई भ्रम टूटते हैं :)

और कई नए सवाल खड़े होते हैं

गजल पसंद आई

मुझे तो कही भी पढ़ने में या गुनगुनाने में में अटकाव महसूस नहीं हुआ

जो शेर खास पसंद आये ---

सत्‍य अन्तिम है क्‍या जान पाई नहीं,
देह से ही हमेशा सटी जि़न्‍दगी।

मौत आई तो इक शब्‍द लिख न सके
उम्र के हाशिये से फटी जि़न्‍दगी।

दिलीप said...

ek sundar lay ke sath gazal prastuti ke liye aabhar...

निर्मला कपिला said...

itanee samajh to nahee ki kahaan kyaa galat hai mujhe to sab sahee lagaa hai ye sher
हैं क्षितिज हमने कितने ही देखे यहॉं
है शिखर, है कभी तलहटी जि़न्‍दगी।
is sher me talhati kaa prayog bahut acchaa lagaa. mere dimaag me ye shabd shaayad hee kabhee aa paataa
हैं क्षितिज हमने कितने ही देखे यहॉं
है शिखर, है कभी तलहटी जि़न्‍दगी।
dil ko choone vaalaa sher hai
करवटें, करवटें ही बदलती रही
जि़न्‍दगी भर मिरी करवटी जि़न्‍दगी।
yahan shayad jindagee bhar rahi karavati jindagee adhik sahee lagataa.ye sher bhee bahut acchha lagaa> dhanyavaad ye gazal paDHavaane ke liye shubhakaamanaayen

Udan Tashtari said...

सत्‍य अन्तिम है क्‍या जान पाई नहीं,
देह से ही हमेशा सटी जि़न्‍दगी।

-वाह! सच में कब जान पाते हैं हम सत्य!

Rajendra Swarnkar said...

आदरणीय तिलक राज कपूरजी
नमस्कार !
बह्रे-मुतदारिक में बहुत प्यारी ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए आभार ! तमाम अश्आर शानदार हैं । अनेक अछूते बिंबों का बख़ूबी प्रयोग किया है आपने ।

आप कहते हैं कि -
"तक्‍तीअ करने पर कुछ पंक्तियॉं बह्र से बाहर लगती हैं,
लेकिन स्‍वरों का खेल है ये, गेयता में बाहर कुछ भी नहीं।"

तक्‍तीअ करते वक़्त वज़्न गिराना तो ध्यान में रहता है ,
वज़्न बढ़ाने में चूक होने की संभावना रहती है ।
सरसरी नज़र से देखने पर मुझे तो यह ग़ज़ल बह्र से बाहर नहीं लगती ।
सिर्फ़…
"मौत आई तो इक शब्‍द लिख न सके
उम्र के हाशिये से फटी जि़न्‍दगी।"
इस शे'र में 'न' को 'ना' उच्चारित करने की ज़रूरत है ।

ग़ज़ल को किसी मज़्हब विशेष की तरह 'निरी दक़्यानूसी ' से आप - हम ही बचा सकते हैं । वैसे भी ग़ज़ल की बुनगट में , नियमों में अंतिम शरण हमारे व्याकरण और काव्य सिद्धांतों की ही ली गई है।
आप क्या कहते हैं ?
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

वाह सर जी ! बहुत सुन्दर ग़ज़ल है ... मुझे ये शेर बहुत अच्छे लगे -
कुछ सपन लेके आगे सरकती रही
उड़ न पाई कभी परकटी जि़न्‍दगी।

कोई सुख जो मिला तो हृदय ने कहा
लग रही है मुझे अटपटी जि़न्‍दगी।

तिलक राज कपूर said...

rajsinhasan@gmail.com से मेल पर प्राप्‍त

यानी कि तिलक भाई जमाना हुआ मिजाज़ शायराना था. ये तो तब की है. अब तो अरसा हुआ तो अब जो सुरुर है ........कहते हैं न कि जितनी पुरानी हो उतना चढ़ के बोलती है :) .

ये तो अब समझ रहे हैं कि चाय की प्याली से चलके आपकी शायिरी अब आबे हयात बन किस मुकाम पे पहुँची है और अभी तो न जाने कितने जाम बाकी हैं .

शुभानल्लाह !

सतीश सक्सेना said...

"ये न पूछो कि कैसे कटी जि़न्‍दगी,
कितने धागों से हमने बटी जि़न्‍दगी।

कुछ सपन लेके आगे सरकती रही
उड़ न पाई कभी परकटी जि़न्‍दगी।"

इन बेहतरीन लाइनों को पढ़कर ठंडी गहरी सांस ही भर के रह गए कपूर साहब !
दिल को छू गयीं यह लाइनें !

सतीश सक्सेना said...

"ये न पूछो कि कैसे कटी जि़न्‍दगी,
कितने धागों से हमने बटी जि़न्‍दगी।

कुछ सपन लेके आगे सरकती रही
उड़ न पाई कभी परकटी जि़न्‍दगी।"

इन बेहतरीन लाइनों को पढ़कर ठंडी गहरी सांस ही भर के रह गए कपूर साहब !
दिल को छू गयीं यह लाइनें !

तिलक राज कपूर said...

@राजेन्‍द्र स्‍वर्णकार जी
ग़ज़ल का जन्‍म भाषा विशेष से जुड़ा है मज्‍़हब से तो इसका यूँ भी कुछ लेना देना नहीं और ग़ज़ल को जितना मैनें पढ़ा और समझा, ऐसा कभी नहीं पाया कि किसी शाइर ने इसे किसी मज्‍़हब विशेष से बॉंधा हो। ग़ज़ल का हर मज्‍़हब ने हमेशा सम्‍मान किया है और ग़ज़ल ने हमेशा हर मज्‍़हब का।
आपका इशारा शायद किसी ऐसे शाइर की तरफ़ है जिसने कभी मंच पर वाह-वाही लूटने के लिये कुछ ऐसे अल्‍फ़ाज़ इस्‍तेमाल कर लिये हों जो आपको आपत्तिजनक लगे हों।
शाइरी इबादत है, और भाषा विशेष के अल्‍फ़ाज़ इस्‍तेमाल कर लेने से यह इबादत टूटती नहीं है अगर वो अल्‍फ़ाज़ चिंगारी का काम न कर रहे हों।
काव्‍य के तत्‍व और सिद्धान्‍त सार्वभैमिक हैं, व्‍याकरण अलग अलग होते हुए भी व्‍याकरण के आधार सिद्धान्‍त समान हैं।

Rajey Sha said...

बहुत ही प्‍यारे शेर, सुहानी गजल।

अर्चना गंगवार said...

ये न पूछो कि कैसे कटी जि़न्‍दगी,
कितने धागों से हमने बटी जि़न्‍दगी।

bahut sunder...

kabeer ji ka taan bana yaad aa gaya..

pran said...

TILAK RAJ JEE,AAPNE ACHCHHEE GAZAL
KAHEE HAI.IS SHER KE LIYE AAPKO
DHERON BADHAAEEYAN AUR SHUBH
KAMNAAYEN--
SATYA ANTIM HAHAI KYAA
JAAN PAAYEE NAHIN
DEH HEE SE HAMESHA
SATEE ZINDGEE

रश्मि प्रभा... said...

हैं क्षितिज हमने कितने ही देखे यहॉं
है शिखर, है कभी तलहटी जि़न्‍दगी।
waah

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

है शिखर, है कभी तलहटी जि़न्‍दगी।
..............तिलकराज जी...मैं तो यहीं ठहर गया....
है शिखर, है कभी तलहटी जि़न्‍दगी।
बस...अभी इसी मिसरे के जितने भी अर्थ निकल सकते हैं, निकालने का प्रयास कर रहा हूं.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

ये न पूछो कि कैसे कटी जि़न्‍दगी,
कितने धागों से हमने बटी जि़न्‍दगी।

कुछ सपन लेके आगे सरकती रही
उड़ न पाई कभी परकटी जि़न्‍दगी।
वाह शुरुआती शेर ही कितने सुन्दर!! पूरी गज़ल बहुत खूबसूरत. आभार.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

ये न पूछो कि कैसे कटी जि़न्‍दगी,
कितने धागों से हमने बटी जि़न्‍दगी।

कुछ सपन लेके आगे सरकती रही
उड़ न पाई कभी परकटी जि़न्‍दगी।
वाह शुरुआती शेर ही कितने सुन्दर!! पूरी गज़ल बहुत खूबसूरत. आभार.

'उदय' said...

धूप में खेलती, मेह में खेलती,
याद आती है वो नटखटी जि़न्‍दगी।
... लाजवाब !!!

jogeshwar garg said...

"है शिखर, है कभी तलहटी ज़िंदगी"

वाह तिलकजी !
बहुत सुन्दर !

डॉ टी एस दराल said...

राज जी , ग़ज़ल और शायरी का ज्यादा ज्ञान तो नहीं लेकिन यही कहूँगा कि
ये न पूछो कि कैसे कटी जि़न्‍दगी,
कभी प्यार कभी तकरार के घागों से सिली जिंदगी।

बढ़िया प्रस्तुति।

mridula pradhan said...

itni achchi rachna ke liye badhyee.

Rajendra Swarnkar said...

आदरणीय तिलक राज कपूरजी
नमस्कार !
आपका आभार मानता हूं ,संवाद के लिए ।
अवश्य ही कुछ तज्रुबों की बिना पर ही कहा । आपकी सोच से अलग नहीं है मेरी सोच ।
संवाद बना रहे …
- राजेन्द्र स्वर्णकार

जेन्नी शबनम said...

tilak ji,
bahut achhi ghazal hai, har sher ek se badhkar ek umda. mukammal ghazal keliye bahut badhai aur shubhkamnayen aapko.

बेचैन आत्मा said...

vaah!

Ankit Joshi said...

नमस्कार तिलक जी,
इस शेर के क्या कहने,
हैं क्षितिज हमने कितने ही देखे यहॉं
है शिखर, है कभी तलहटी जि़न्‍दगी।
जिस ज़मीं पे ये बनी है वो तो बेमिसाल है,

चाय की चुस्कियों में कटी जि़न्‍दगी,
प्‍यालियों, प्‍यालियों में बँटी जि़न्‍दगी।

नीरज गोस्वामी said...

तिलक साहब रोज़ मर्रा के काम निपटाते दो दिन की छुट्टियों का लुत्फ़ उठाते उठाते उठाते यहाँ पहुँचने में लेट हो गया....उम्मीद करता हूँ मेरी गैर हाजरी से आपकी पेशानी पर अभी तक शिकन नहीं पड़ी होगी...
इस ग़ज़ल के नायाब काफियों ने दिल लूट लिया...एक दो नहीं कितने की काफिये आपने इस ग़ज़ल में डाले हैं जो बेहद नयापन लिए हुए हैं और अपने हुस्न से इस ग़ज़ल को नयी परवाज़ दे रहे हैं... भाई दिल से दाद कबूल करें...क्या कमाल की ग़ज़ल कह गए हैं...वाह...आपकी धारधार कलम की सलामती के लिए ऊपर वाले से दुआ करता हूँ...

नीरज

arun c roy said...

bahut hi umda gazal... zindi ki hakikat to chai ke pyali me samet kar rakh diya... adbhud

महावीर said...

ग़ज़ल पढने में आनंद आगया. ये अश'आर बहुत पसंद आये:
मौत आई तो इक शब्‍द लिख न सके
उम्र के हाशिये से फटी जि़न्‍दगी।

सत्‍य अन्तिम है क्‍या जान पाई नहीं,
देह से ही हमेशा सटी जि़न्‍दगी।
महावीर शर्मा

दिगम्बर नासवा said...

कितनी नाज़ुकी से बयाँ किया है आपने .... बहुत कुछ सीखना है आपसे तिलक राज जी .... कमाल की ग़ज़ल है ...